भारत की केंद्र सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप को एक विश्वस्तरीय केंद्र बनाने का एक बड़ा फैसला लिया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (GNIP) नाम दिया गया है, जिसकी अनुमानित लागत 75,000 करोड़ रुपये है। इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक मजबूत सामरिक (strategic) और आर्थिक ताकत बनाना है।
परियोजना का उद्देश्य और योजना
यह योजना नीति आयोग के मार्गदर्शन में बनाई गई है और इसे 30 सालों में कई चरणों में पूरा किया जाएगा। इस परियोजना में चार मुख्य हिस्से हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल (ICTT): यह एक बड़ा बंदरगाह होगा, जो दुनिया भर के जहाजों के लिए एक महत्वपूर्ण ठहराव केंद्र बनेगा। यह बंदरगाह गैलाथिया खाड़ी में बनेगा। इसका उद्देश्य भारत की व्यापारिक जहाजों को दूसरे देशों के बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करना है।
- ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: एक नया हवाई अड्डा बनाया जाएगा जो नागरिक और सैन्य दोनों तरह के उपयोग के लिए होगा। यह हवाई अड्डा द्वीप की कनेक्टिविटी को बढ़ाएगा और भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगा।
- टाउनशिप विकास: लगभग 3-4 लाख लोगों के रहने के लिए एक नया शहर बसाया जाएगा, जिसमें घर, स्कूल, अस्पताल और अन्य सुविधाएं होंगी।
- बिजली संयंत्र: द्वीप की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक 450 MVA का गैस और सौर ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र बनाया जाएगा।
परियोजना का महत्व
ग्रेट निकोबार द्वीप का स्थान भारत के लिए बहुत खास है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जहां से दुनिया का लगभग एक-तिहाई व्यापार होता है। इस परियोजना से भारत को कई तरह के फायदे होंगे:
- चीन का मुकाबला: हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए यह परियोजना बहुत जरूरी है। यह भारत को इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में मदद करेगी।
- व्यापार का केंद्र: यह बंदरगाह भारत को वैश्विक व्यापार मार्गों से जोड़ेगा और सिंगापुर जैसे देशों पर हमारी निर्भरता को कम करेगा। इससे भारत को आर्थिक रूप से काफी फायदा होगा।
- रोजगार और पर्यटन: इस परियोजना से स्थानीय लोगों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और द्वीप पर पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
परियोजना से जुड़ी चिंताएं
इतने बड़े फायदे होने के बावजूद, यह परियोजना कई चिंताओं और विवादों से घिरी हुई है। ये चिंताएं मुख्य रूप से पर्यावरण और स्थानीय लोगों से जुड़ी हैं।
- वन और वन्यजीवों को नुकसान: इस परियोजना के लिए 13,075 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र को खत्म किया जाएगा, जिससे लगभग 10 लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे।
यह द्वीप का एक बड़ा हिस्सा है और इससे यहां के खास उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rainforest) नष्ट हो जाएंगे।
लेदरबैक समुद्री कछुआ: गैलाथिया खाड़ी में स्थित वन्यजीव अभयारण्य में लुप्तप्राय लेदरबैक समुद्री कछुए रहते हैं। यह जगह इन कछुओं के लिए दुनिया के सबसे बड़े घोंसले के स्थलों में से एक है। बंदरगाह बनने से इनका जीवन खतरे में पड़ सकता है।
निकोबार मेगापोड: यह एक खास प्रकार का पक्षी है जो केवल इसी द्वीप पर पाया जाता है। इसके आवास भी खतरे में हैं।

- स्थानीय जनजातियों का भविष्य: ग्रेट निकोबार द्वीप पर दो आदिवासी समुदाय – शोम्पेन और निकोबारी जनजाति रहते हैं। ये लोग जंगलों पर निर्भर हैं और सदियों से वहीं रह रहे हैं।
- आलोचकों का कहना है कि यह परियोजना इन समुदायों के अधिकारों का हनन करेगी और उन्हें उनके घरों से विस्थापित कर सकती है। हालांकि सरकार ने कहा है कि जनजातीय समुदायों के अधिकारों का ध्यान रखा जाएगा और उनके लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएंगी।
- भूकंप का खतरा: यह द्वीप भूकंप और सुनामी के लिहाज से बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। 2004 की सुनामी ने यहां भारी तबाही मचाई थी। इस तरह की बड़ी इमारतों के निर्माण से यहां भू-वैज्ञानिक खतरा और भी बढ़ सकता है।
ग्रेट निकोबार परियोजना पर राहुल और सोनिया गांधी का विरोध
कांग्रेस पार्टी, और विशेष रूप से सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने, ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का कड़ा विरोध किया है। उनका मानना है कि यह परियोजना पर्यावरण और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
ग्रेट निकोबार परियोजना पर कांग्रेस का विरोध
कांग्रेस पार्टी, विशेषकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी, ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह परियोजना पर्यावरण और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए एक बड़ा खतरा है।
राहुल गांधी का विरोध:
- आदिवासी अधिकारों का उल्लंघन: राहुल गांधी का आरोप है कि इस परियोजना के लिए शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों से ठीक तरह से सलाह नहीं ली गई, जो कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) के नियमों का उल्लंघन है।
- अधूरी जानकारी पर सहमति: उन्होंने कहा कि आदिवासी परिषद से दबाव में और अधूरी जानकारी के आधार पर NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) लिया गया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।
सोनिया गांधी का विरोध:
- पर्यावरणीय और मानवीय आपदा: सोनिया गांधी ने इस परियोजना को एक “सुनियोजित दुस्साहस” और “पारिस्थितिक आपदा” बताया है।
- वन और जनजातियों का विनाश: उन्होंने चिंता जताई कि लाखों पेड़ काटे जाएंगे, जिससे द्वीप के खास वर्षावन नष्ट हो जाएंगे और आदिवासी समुदायों, खासकर शोम्पेन जनजाति, का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
- जोखिम भरा निर्माण: उन्होंने यह भी कहा कि यह द्वीप भूकंप और सुनामी के लिहाज से बहुत संवेदनशील है, और ऐसे खतरनाक क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर निर्माण करना लोगों और पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा जोखिम है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार इस परियोजना को कानूनी और पर्यावरणीय चुनौतियों के बावजूद जबरदस्ती आगे बढ़ा रही है, जो राष्ट्रीय मूल्यों के साथ विश्वासघात है।
सरकार का पक्ष और समाधान
सरकार का कहना है कि परियोजना के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं।
- पर्यावरणीय मंजूरी: सरकार ने कहा है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही परियोजना को मंजूरी दी गई है।
- मुआवजा और पुनर्वास: काटे गए पेड़ों के बदले दूसरे राज्यों में वन लगाए जाएंगे (Compensatory Afforestation)। साथ ही, जनजातीय समुदायों के हितों की रक्षा के लिए तीन स्वतंत्र समितियां बनाई गई हैं जो विकास के काम पर नजर रखेंगी।
- पर्यावरण के अनुकूल योजना: भूकंप से सुरक्षा के लिए मजबूत निर्माण किया जाएगा और बिजली के लिए सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग किया जाएगा।
यह परियोजना भारत के विकास और सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण और मानवीय अधिकारों को बचाने की चुनौती भी सामने है। यह देखना होगा कि सरकार इन दोनों महत्वपूर्ण पहलुओं के बीच कैसे संतुलन स्थापित करती है।