2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या एक गहरा सामाजिक झटका था। वह घटना केवल एक छात्र की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर एक सवाल था जिसमें जाति, विचारधारा और प्रशासनिक निष्क्रियता की जटिलताएं एकत्रित हो गई थीं। रोहित की मौत के बाद पूरा देश आंदोलित हुआ, विश्वविद्यालयों में बहसें छिड़ीं, राजनेताओं ने मौके को अपने-अपने दृष्टिकोण से भुनाया, और सामाजिक न्याय की परिभाषाएं फिर से लिखी जाने लगीं।
इसी सामाजिक वातावरण के दबाव में अब कर्नाटक सरकार ने “रोहित वेमुला एक्ट” लाने की घोषणा की है। इस कानून का उद्देश्य शैक्षणिक परिसरों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक छात्रों के साथ होने वाले कथित भेदभाव को रोकना बताया जा रहा है। परंतु इस कानून की संरचना और उसकी भाषा इतनी एकतरफा है कि वह भेदभाव को रोकने की जगह, नए प्रकार के भेदभाव को जन्म देती है और उस निशाने पर है एक खास वर्ग: सामान्य (जनरल) वर्ग।

‘महसूस’ करना ही अपराध का आधार कैसे
रोहित वेमुला एक्ट की सबसे खतरनाक विशेषता है “फीलिंग” या “अनुभूति” का आधार बन जाना। अगर कोई छात्र यह “महसूस करता है” कि उसके साथ जातिगत या धार्मिक भेदभाव हुआ, तो वह व्यक्ति, शिक्षक या छात्र, सीधे कानून के शिकंजे में आ सकता है, बिना प्राथमिक जाँच, बिना साक्ष्य, बिना सुनवाई। ऐसे मामलों में न सिर्फ़ आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है, बल्कि ये अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय होंगे। इसके अलावा, संबंधित संस्थान यानी कॉलेज प्रशासन को भी सह-अभियुक्त बनाया जाएगा।
सवाल यह है कि क्या “अनुभूति” को कानून का आधार बनाना न्यायसंगत है क्या एक लोकतांत्रिक देश में भावनाओं को कानूनी साक्ष्य के समकक्ष खड़ा किया जा सकता है
शिक्षा के मंदिर में भय का प्रवेश
इस कानून का प्रभाव केवल न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा। इसका मनोवैज्ञानिक असर गहरा और व्यापक होगा। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर अब हर शब्द सोच-समझकर बोलेंगे, हर मूल्यांकन पर दो बार विचार करेंगे, और छात्रों के साथ संवाद करते हुए हर क्षण डरेंगे कि कहीं कोई ‘अनुभव’ उनके खिलाफ न हो जाए। इस डर का सबसे अधिक असर सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों पर पड़ेगा, जो पहले ही सीटों और संसाधनों की सीमित उपलब्धता से जूझ रहे हैं।
जनरल कैटेगरी: एक पूर्वनिर्धारित अपराधी
भारत में पहले ही शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक है। इसका सीधा अर्थ है कि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कुल सीटों का लगभग आधा हिस्सा ही उपलब्ध है। ऐसे में यदि इन सीमित अवसरों के बीच कोई छात्र झूठे आरोप की चपेट में आता है, तो उसकी पूरी शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी नौकरी का सपना टूट जाता है।
सोचिए, एक सामान्य वर्ग का छात्र UPSC, NEET, GATE जैसी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। उसी बीच किसी साथी छात्र ने ‘महसूस’ किया कि उसने जातिगत टिप्पणी की है। एफआईआर दर्ज होती है, केस चलता है, उसका करियर वहीं खत्म हो जाता है। बिना दोष सिद्ध हुए भी आरोपी का नाम समाज में बदनाम हो जाएगा और सरकारी नौकरियों में ‘मामले लंबित होने’ के आधार पर अयोग्यता ठोक दी जाएगी।
क्या इसे एक योजनाबद्ध सामाजिक इंजीनियरिंग नहीं कहा जाना चाहिए क्या इसे जनरल वर्ग को धीरे-धीरे व्यवस्था से बाहर करने की रणनीति नहीं कहा जाए
इतिहास खुद को दोहरा रहा है: रोलट एक्ट की पुनरावृत्ति
1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में “रोलट एक्ट” लागू किया था। यह कानून कहता था कि सरकार को यह अधिकार होगा कि वह किसी को भी “ब्रिटिश विरोधी गतिविधि” के शक में बिना मुकदमा, बिना वकील और बिना अपील के गिरफ्तार कर सकती है। उस कानून के खिलाफ़ देशभर में आक्रोश पनपा, जिसका चरम रूप जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड था।
रोहित वेमुला एक्ट भी कुछ वैसा ही प्रतीत होता है, सिर्फ़ उपनिवेशवाद की जगह अब जातिवाद और वोटबैंक राजनीति ने ले ली है। यह एक्ट कानून से ज्यादा राजनीतिक एजेंडा लग रहा है, जहाँ तथ्यों और न्याय से ज्यादा “आहत भावना” को प्राथमिकता दी जा रही है।
राजनीति या न्याय
इस कानून की टाइमिंग और भाषा पर भी सवाल उठने लाजिमी हैं। क्या यह कानून सिर्फ़ रोहित वेमुला के नाम पर संवेदनाओं को भुनाने का प्रयास है क्या यह आने वाले चुनावों में जातिगत ध्रुवीकरण का एक उपकरण नहीं है
सवाल ये भी है कि क्या सरकार ने संस्थानों में पहले से मौजूद “SC/ST Atrocities Act”, “Minority Protection Commissions” और विश्वविद्यालयी शिकायत निवारण तंत्र का आकलन किया है या फिर यह एक नया कानून केवल इसीलिए लाया जा रहा है ताकि कुछ वर्गों को ‘अधिक सुरक्षित’ और दूसरों को ‘अधिक असुरक्षित’ किया जा सके
समाज को जोड़ने या तोड़ने वाला कानून
हमारे संविधान की आत्मा ‘समरसता’ है, समान अवसर, समान अधिकार और निष्पक्ष न्याय। कोई भी कानून अगर जाति या धर्म के आधार पर पक्षपात को बढ़ावा देता है, तो वह संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ जाता है।
रोहित वेमुला एक्ट की मौजूदा प्रकृति समाज को जोड़ने के बजाय, और ज्यादा तोड़ने की क्षमता रखती है। यह संवाद की जगह संदेह को, समावेश की जगह आरोप को, और विचारों की जगह भय को प्राथमिकता देता है।
एक नई विभाजन रेखा
रोहित वेमुला एक्ट का विचार तब सार्थक हो सकता था जब यह बिना किसी जातीय पूर्वाग्रह के, समग्र न्याय के लिए तैयार होता। लेकिन वर्तमान प्रारूप में यह कानून न केवल संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देता है, बल्कि समाज को एक नई जातीय खाई में धकेल देता है।
जातीय भेदभाव का अंत जरूरी है, परंतु वह न्याय की कीमत पर नहीं होना चाहिए। अन्यथा यह एक नई असमानता को जन्म देगा और इस बार पीड़ित वह होगा जो न तो ‘विशेष’ है, न ही ‘आरक्षित’।
यह पॉलिटिकल एक्ट है और राहुल गांधी समाज में नफरत को बढ़ा कर सत्ता की सवारी करना चाहते हैं। जिस रिजर्वेशन के खिलाफ उनके पिताजी और दादी ने आवाज उठाया था उसके ठीक विपरीत जाकर वो ये संदेश देना चाहते हैं के उनको भारत के भविष्य की कोई चिंता नहीं है, उन्हें सिर्फ अपनी राजनैतिक भविष्य की चिंता है।