फौजा सिंह का जन्म 1 अप्रैल 1911 को ब्रिटिश भारत के पंजाब स्थित ब्यास पिंड गांव में हुआ था। बचपन में वे इतने दुबले-पतले और कमज़ोर थे कि 5 साल की उम्र तक ठीक से चल भी नहीं पाते थे। लोग उन्हें ‘डंडा’ कहकर चिढ़ाते थे। लेकिन खेतों में काम और ग्रामीण जीवनशैली ने उनकी सहनशक्ति को धीरे-धीरे मजबूत बनाया।
उनकी शादी गियान कौर से हुई और उनके छह बच्चे हुए। 1990 के दशक की शुरुआत में जब उनकी पत्नी और एक बेटे की मौत हुई, तो वे टूट गए। फिर उन्होंने 1995 में लंदन में बसे बेटे के पास जाकर रहना शुरू किया। दुख और अवसाद से जूझते हुए उन्होंने टहलना शुरू किया और फिर दौड़ को जीवन का उद्देश्य बना लिया।
89 की उम्र में दौड़ की शुरुआत

89 साल की उम्र में उन्होंने टीवी पर लंदन मैराथन देखी और वहीं से उनके भीतर कुछ जागा। उन्होंने कोच हरमंदर सिंह के साथ ट्रेनिंग शुरू की और 2000 में अपनी पहली मैराथन (लंदन) पूरी की – वो भी 6 घंटे 54 मिनट में। यह उनके आयु वर्ग के लिए विश्व रिकॉर्ड से एक घंटे तेज़ था।
इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क, टोरंटो, लंदन जैसे कई अंतरराष्ट्रीय मैराथन में भाग लिया। 2003 में टोरंटो में 92 साल की उम्र में उन्होंने 5 घंटे 40 मिनट में मैराथन पूरी कर सबको चौंका दिया।
पहला सेंचुरीधारी मैराथन धावक
16 अक्टूबर 2011 को, उन्होंने इतिहास रच दिया। 100 साल की उम्र में टोरंटो वॉटरफ्रंट मैराथन को 8 घंटे 11 मिनट में पूरा कर वे दुनिया के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने 100 की उम्र में पूरी मैराथन पूरी की। हालांकि गिनीज बुक ने जन्म प्रमाणपत्र की कमी के कारण रिकॉर्ड को मान्यता नहीं दी, लेकिन दुनिया ने उन्हें अपना हीरो मान लिया।
सम्मान और लोकप्रियता

उनकी प्रेरक यात्रा ने उन्हें विश्व स्तर पर लोकप्रिय बना दिया। उन्हें एडिडास ने अपनी मशहूर “इम्पॉसिबल इज़ नथिंग” अभियान में शामिल किया। 2012 में लंदन ओलंपिक के दौरान उन्होंने टॉर्च कैरी की। 2015 में उन्हें ब्रिटिश एम्पायर मेडल से नवाजा गया। उनके जीवन पर आधारित बच्चों की किताब “Fauja Singh Keeps Going” ने उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाया।
अंतिम पड़ाव और विरासत
2013 में उन्होंने 101 की उम्र में हांगकांग में 10 किलोमीटर दौड़ कर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ को अलविदा कहा। लेकिन दौड़ उनकी दिनचर्या में बनी रही। उनका मानना था – “मैं रिकॉर्ड के लिए नहीं दौड़ता, मैं दौड़ता हूँ ताकि लोगों को प्रेरणा दे सकूं।”
उनकी मौत ने दुनियाभर में शोक की लहर फैला दी। पंजाबी गायक दिलजीत दोसांझ ने उन्हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें “फिटनेस की प्रेरणा” बताया।
फौजा सिंह हमें क्या सिखा गए?
- उम्र सिर्फ एक संख्या है – 89 की उम्र में शुरुआत और 100 की उम्र में कीर्तिमान।
- दुख को शक्ति में बदलना – निजी नुकसान को प्रेरणा बनाकर नई राह बनाई।
- संस्कृति का गर्व – पगड़ी पहन कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दौड़ना, एक सांस्कृतिक प्रतीक।
- स्थायित्व और समर्पण – आजीवन फिटनेस और सकारात्मकता का उदाहरण।
निष्कर्ष
फौजा सिंह सिर्फ धावक नहीं थे, वे चलते-फिरते संदेश थे – कि जीवन में कभी भी देर नहीं होती। उन्होंने दिखाया कि इंसानी जज़्बा उम्र, शरीर और समय से बड़ा होता है। उनकी आखिरी दौड़ सड़क पर खत्म हुई, लेकिन उनकी प्रेरणा की दौड़ कई पीढ़ियों तक चलती रहेगी।