किशनगंज विधानसभा: BJP ने आज तक नहीं जीती यह सीट, क्या मो. अमानुल्लाह बदल सकते हैं इतिहास?

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Bihar election 2025

ब्यूरो, पटना

किशनगंज विधानसभा बिहार की सबसे चर्चित और संवेदनशील सीटों में से एक है। यह सीट सिर्फ़ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि सीमांचल की राजनीति की नब्ज़ है, जहाँ जातीय समीकरण, धार्मिक जनसंख्या और सामाजिक मुद्दों का सीधा असर पड़ता है।

पिछले तीन दशकों में कांग्रेस, RJD और हाल में AIMIM जैसे दलों ने यहाँ अपना दबदबा बनाए रखा। इसके उलट, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए यह क्षेत्र अब तक एक ‘अजेय किला’ रहा है। पार्टी ने कई बार दांव खेला, लेकिन नतीजा हर बार हार ही रहा।

चुनावी इतिहास: हार की लकीर

पिछले चार विधानसभा और एक उपचुनाव के आँकड़े साफ़ दिखाते हैं कि BJP को यहाँ जीत की जमीन तलाशने में भारी मुश्किल आई

  • 2010 — डॉ. मोहम्मद जावेद (कांग्रेस) ने BJP की स्वीटी सिंह को मात्र 264 वोटों से हराया। यह BJP के लिए सबसे करीबी मुकाबला था।
  • 2015 — जावेद ने जीत का अंतर बढ़ाकर 8,609 वोट कर लिया, जिससे BJP के लिए वापसी और कठिन हो गई।
  • 2019 (उपचुनाव) — कांग्रेस के जावेद के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उपचुनाव में AIMIM के क़मरुल होदा ने BJP को 10,043 वोटों से मात दी।
  • 2020 — कांग्रेस के इज़हारुल हुसैन ने स्वीटी सिंह को 1,381 वोट से हराया।

एक ही उम्मीदवार के साथ लगातार चार चुनावों में उतरने के बावजूद BJP जीत के करीब भी नहीं पहुंच पाई।

क्यों मुश्किल है BJP के लिए यह सीट?

  • मुस्लिम बहुल इलाका: किशनगंज विधानसभा में मुस्लिम आबादी 65% से अधिक है, और यह वोट बैंक अब तक कांग्रेस, RJD और AIMIM जैसी पार्टियों में बंटा रहा है, BJP के खाते में लगभग कुछ भी नहीं आया।
  • सामाजिक समीकरण: शेष वोटर आदिवासी, महादलित और सीमित संख्या में सवर्ण व पिछड़ा वर्ग हैं।
  • स्थानीय जुड़ाव की कमी: BJP के उम्मीदवारों का स्थानीय स्तर पर जमीनी नेटवर्क अपेक्षाकृत कमजोर रहा है।
  • विचारधारा की दूरी: धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा BJP से दूरी बनाए हुए है।

राजनीतिक सफ़र और उपलब्धियाँ

भाजपा में शुरुआत (1999):

  • सन 1999 में भारतीय जनता पार्टी के प्राथमिक सदस्य और सक्रिय कार्यकर्ता बने।
  • 1999 के किशनगंज लोकसभा चुनाव के दौरान किशनगंज ग्रामीण मंडल (काचाधामन विधानसभा) में मंडल उपाध्यक्ष के रूप में कार्य।

संगठन और जनप्रतिनिधि पद:

  • 2003: पंचायत समिति सदस्य, मोतीहारा तालुका (पूर्व भाग)।
  • 2009–2024: पैक्स चेयरमैन।
  • 2021–2025: किशनगंज प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि।
  • 2022–2027: व्यापार मंडल सहयोग समिति, किशनगंज — अध्यक्ष।
  • 2025–2030: बिस्कोमान जिला अध्यक्ष, किशनगंज।

पार्टी के लिए कार्य:

  • 1999 से निस्वार्थ रूप से पार्टी संगठन को मज़बूती दी।
  • किशनगंज विधानसभा के 20 पंचायतों में संगठन का विस्तार और चुनावी जीत सुनिश्चित करने में योगदान।
  • विभिन्न पंचायतों में 15 मुखिया के चुनाव में सक्रिय भूमिका।
  • मुस्लिम बहुल क्षेत्र में भाजपा का झंडा घर-घर पहुँचाने का अभियान।

मो. अमानुल्लाह BJP के लिए ‘गेम चेंजर’ की उम्मीद

किशनगंज के मूल निवासी मो. अमानुल्लाह सुरजापुरी (देशी) बिरादरी से हैं। उनका परिवार लगभग दो सदियों से इस क्षेत्र में रह रहा है। वे लंबे समय से भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं और स्थानीय मुस्लिम समाज में उनकी अच्छी-खासी पकड़ है।

उनके समर्थकों के मुताबिक, अमानुल्लाह का असर सिर्फ एक बिरादरी तक सीमित नहीं, बल्कि किशनगंज शहर और ग्रामीण दोनों इलाकों में फैला हुआ है। वे व्यक्तिगत रूप से लगभग 10,000 मुस्लिम वोटरों पर सीधा प्रभाव रखते हैं, जो उन्हें व्यक्तिगत रिश्तों और सामाजिक जुड़ाव के कारण समर्थन देते हैं।

अमानुल्लाह कहते हैं:

“अगर पार्टी मुझे टिकट देती है, तो मैं चुनाव जीतकर विपक्षी नेताओं द्वारा फैलाए गए भय को खत्म करूंगा। पश्चिम बंगाल पलायन कर चुके आदिवासी और महादलित परिवारों का पुनर्वास करूंगा, और केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ हर ज़रूरतमंद तक पहुँचाऊंगा।”

समीकरण कैसे बदल सकते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमानुल्लाह का 10,000 का निजी वोट बेस BJP में ट्रांसलेट होता है, तो यह चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है।

  • 2010 और 2020 में BJP की हार का अंतर क्रमशः 264 और 1,381 वोट था — यह गैप मुस्लिम वोट जुड़ने पर आसानी से पाटा जा सकता है।
  • अगर मुस्लिम वोट के साथ-साथ आदिवासी और महादलित वोटों को भी जोड़ा जाए, तो BJP को इतिहास रचने का मौका मिल सकता है।
  • यह पहली बार होगा जब BJP के पास यहाँ एक मुस्लिम चेहरा होगा जो पार्टी के साथ वैचारिक और सामाजिक दोनों रूप से खड़ा है।

संभावित असर: चुनाव से आगे की राजनीति

अगर BJP किशनगंज में जीत दर्ज करती है, तो इसका असर सीमांचल की राजनीति पर दूरगामी होगा —

  • पार्टी मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ाने की रणनीति को मजबूत कर पाएगी।
  • सीमांचल में अब तक हाशिये पर रही BJP को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी।
  • कांग्रेस और AIMIM के लिए यह एक बड़ा झटका होगा, क्योंकि दोनों पार्टियां यहाँ के मुस्लिम वोट पर लंबे समय से निर्भर रही हैं।

निष्कर्ष:

“अगर BJP अमानुल्लाह पर भरोसा करती है, तो यह सिर्फ़ एक चुनाव नहीं, बल्कि सीमांचल में राजनीतिक धारा बदलने की शुरुआत हो सकती है।”

Taazi Post

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