संसद के गलियारे शांत हैं। सांसदों के चेहरे निर्विकार हैं। कोई सवाल नहीं, कोई नारा नहीं, कोई चर्चा नहीं जैसे देश में कुछ हुआ ही नहीं। बाहर, दिल्ली की गर्म सड़कों पर, धूप में झुलसते, पुलिस की लाठी खाते, उम्मीदों से भरे कुछ नौजवान खड़े हैं SSC अभ्यर्थी। ये वही युवा हैं जिनसे देश के भविष्य की बातें की जाती हैं, जिनसे “नए भारत” की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब उनके भविष्य के साथ खुलेआम खिलवाड़ होता है, तब संसद मौन है।
बेटा अपना हो तो विदेश में, और गरीब का बेटा सड़कों पर?
क्या सांसदों की ये खामोशी सिर्फ इसलिए है क्योंकि उनके बेटे-बेटियाँ ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड में पढ़ रहे हैं?
क्या इसलिए कि उनके बच्चों को कभी SSC परीक्षा के सेंटर पर जाकर पहचान पत्र नहीं दिखाना पड़ता?
क्या इसलिए कि उन्हें कभी सुबह 4 बजे उठकर सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी अनजान जिले में परीक्षा देने नहीं जाना पड़ता?
नहीं, उन्हें ये सब सहना नहीं पड़ता, क्योंकि वे सत्ता के बेटे हैं। और जो लड़का दिल्ली की सड़कों पर भीगा हुआ पसीने में, पिटा हुआ लाठियों से, भूखा बैठा है, वो सिर्फ एक वोटर का बेटा है।

ये छात्र कोई आंदोलनकारी नहीं, ये तो माँ के सपने हैं
ये प्रदर्शनकारी छात्र सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं मांग रहे।
वे माँ-बाप की जमीन गिरवी रखकर कोचिंग पढ़ने की कीमत चुका रहे हैं।
वे उस माँ की आंखों का सपना हैं, जिसने अपनी गहनी बेचकर फार्म भरवाया था।
वे उस बाप का सहारा हैं, जो चाहता था कि उसका बेटा खाकी वर्दी में गांव लौटे।
क्या वो सपने अब किसी कीमत पर नहीं गिनते?
संसद का अपराध

जब कोई उद्योगपति भागता है, संसद में चर्चा होती है।
जब किसी नेता पर हमला होता है, संसद ठप हो जाती है।
लेकिन जब लाखों छात्रों का भविष्य SSC की लापरवाही से उजड़ता है
संसद खामोश रहती है।
इस चुप्पी में अपराध है।
इस खामोशी में वोटों की गंध है।
इस घुटन में लोकतंत्र की हार है।
माँ रो रही है, और नेता हँस रहे हैं
सोचिए, कितनी मांएं हर रात रोकर सो रही होंगी।
“बाबू परीक्षा में गया था, लौटकर बोला – मां सेंटर ही नहीं मिला।”
“मां, कंप्यूटर बंद था, पेपर शुरू नहीं हुआ।”
“मां, बाहर बाउंसर खड़ा था, उसने मार दिया।”
और मां के पास कोई जवाब नहीं। न स्कूल है, न शिक्षक, न प्रधान, न सांसद।
क्या अब नौकरी मांगना गुनाह है?

किसी जमाने में कहा जाता था पढ़ो, मेहनत करो, इम्तिहान दो, और नौकरी पाओ।
आज कहा जा रहा है
“पढ़ो मत, पेपर तो रद्द हो जाएगा।
दिखो मत, लाठी खा जाओगे।
बोलो मत, ‘अराजक’ कहे जाओगे।”
क्या यही है ‘नया भारत’? क्या यही है अमृतकाल?
इन बच्चों को मत भूलिए, ये सिर्फ वोट नहीं, उम्मीद हैं
हर सांसद, हर मंत्री को याद रखना चाहिए
जो बच्चा आज जंतर मंतर पर भीख नहीं मांग रहा, नारे लगा रहा है
वो लोकतंत्र का आखिरी दीया है।
जब वो भी बुझ जाएगा, तो संसद की कुर्सियां तो बचेंगी,
लेकिन विश्वास नहीं बचेगा।
अंतिम शब्द
संसद में बैठे हर जनप्रतिनिधि से यही सवाल है
“क्या आपके बच्चे कभी सरकारी परीक्षा देने गए?”
“क्या आपने कभी भूखे पेट रिजल्ट का इंतज़ार किया?”
“क्या आपने कभी रोती मां से झूठ बोला कि नौकरी पक्की है?”
यदि नहीं, तो कम से कम उन लाखों गरीब माँओं की पीड़ा समझिए, जिनके बेटे आज आपकी चुप्पी में जल रहे हैं।
खामोश मत रहिए।
ये बच्चे आपसे कुछ नहीं, सिर्फ न्याय मांग रहे हैं।
न्याय, जिसे देना आपका धर्म है।