जब बिहार की ज़मीन पर कोई नई सियासत का ज्वाला प्रज्वलित होता है, तो उसकी चिंगारी दूर-दूर तक फैल जाती है। 1970 के दशक के अंत और 80 के दशक के शुरुआत में, जब बिहार की राजनीति में धारा के खिलाफ चलने वालों की कमी नहीं थी, तब एक नया नाम सामने आया, बी. पी. मंडल। उनका नाम ऐसा था, जो राजनीति के मठों में एक झंकार सा था, जो सत्ता के महलों को झकझोरने का साहस रखता था।
कहानी तो वैसे भी अक्सर बहादुरी की होती है, मगर बी. पी. मंडल की कहानी उस जुझारू राजनेता की थी, जिसने सत्ता के शिखर से लेकर समाज के निचले पायदान तक की यात्रा की। वे सत्ता के पीछे भागने वाले नेता नहीं थे, बल्कि उस समाज के लिए थे जो अब तक राजनीति में ‘दूसरे दरजे’ के नागरिक की तरह जीवन जी रहा था।
जातिवाद और संघर्ष
अब कहानी के पहले पन्ने पर आ जाइए। यह वही दौर था जब बिहार में जातिवाद के जाल में बुरी तरह उलझी हुई राजनीति थी। उस वक्त जब राज्य के महलों में ‘जाति के ठेकेदार’ अपनी रोटियाँ सेंक रहे थे, बी. पी. मंडल ने खुद को एक अवलंब बना लिया उन वर्गों के लिए जिन्हें सत्ताधारी वर्ग ने अनदेखा कर दिया था।
बी. पी. मंडल का नाम आते ही जो शब्द जेहन में आते हैं, वे हैं ‘आरक्षण’, ‘मंडल आयोग’ और ‘समानता’। यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक संघर्ष की मिसाल बनाई थी। जब उन्होंने ‘मंडल आयोग’ की सिफारिशों की बात की, तो मानो उन्होंने बिहार की राजनीति के जंगले को अपनी तक़दीर से फिर से काटने का काम किया। उनके कदमों ने देश के पिछड़े वर्गों को न केवल अधिकार दिलाए, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ाया।
उनकी सख्त आवाज़ में वही गूंज थी, जो किसी शेर की दहाड़ में होती है। ‘मंडल आयोग’ ने जहां एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत की, वहीं बी. पी. मंडल के क़दमों ने उसकी धारा को सही दिशा दी।
समानता की तलाश में एक नेता
बी. पी. मंडल की राजनीति का मर्म था, ‘समानता’। वे यह जानते थे कि राजनीति अगर किसी एक वर्ग के लिए है, तो वह असल राजनीति नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने हमेशा उस वर्ग की वकालत की, जो दबा-ढका हुआ था, जिसे सत्ता के केंद्र में आने का कभी मौका नहीं मिला। उनके लिए यह कोई साधारण चुनावी मामला नहीं था, बल्कि यह एक आंदोलन था, एक सामाजिक परिवर्तन की ओर।
वे राजनीति के उस ठेठ खिलाड़ी की तरह थे, जो अपनी चाल से सिर्फ खेल नहीं बदलता, बल्कि खेल की दिशा भी तय करता है। उनके लिए राजनीति केवल भाषण देने की बात नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसा युद्ध था, जिसमें जीत किसी एक जाति की नहीं, बल्कि समाज के हर तबके की होती थी।
बी. पी. मंडल का अनकहा जज़्बा
बी. पी. मंडल के व्यक्तित्व में वह कमी थी, जो अन्य नेताओं में आसानी से मिल जाती है, ध्यान आकर्षित करने की क्षमता। वे न तो चमकदार शब्दों में बंधे थे और न ही किसी प्रचार की चाहत रखते थे। वे तो बस उस दिशा में चल रहे थे, जहां उनका दिल कहता था। उनकी राजनीति में एक अपूर्व सादगी थी, जो कभी चकाचौंध में नहीं बही।
जब बी. पी. मंडल ने ‘मंडल आयोग’ की रिपोर्ट दी, तो यह एक रक्षात्मक दस्तावेज़ से अधिक एक जन आंदोलन बन गया। उन दिनों की गूंज आज भी सुनाई देती है, “मंडल आयोग जिंदाबाद!” बिहार के छोटे-छोटे गाँवों से लेकर शहरी महलों तक उनकी राजनीति की लहर दौड़ पड़ी थी।
नफरत और सम्मान का संलयन
लेकिन राजनीति का सच यह है कि यहां आप कितनी ही नेक राहों पर चलें, आलोचनाओं का सामना करना तो तय है। बी. पी. मंडल को भी यह आलोचनाएँ झेलनी पड़ीं। जातिवादियों ने उन्हें घेरने की हर कोशिश की, लेकिन मंडल ने कभी अपनी राह नहीं बदली। वे यह मानते थे कि अगर सच का पीछा किया जाए तो विरोधी सामने आएंगे ही। वे जानते थे कि जो रास्ता वे चुनने जा रहे हैं, वह किसी आसान मार्ग से नहीं हो सकता, फिर भी वे उस रास्ते पर बढ़ते गए।
आज जब हम उनके कार्यों पर विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि बी. पी. मंडल का योगदान केवल बिहार के लिए नहीं था, बल्कि उन्होंने पूरे देश में समाजिक न्याय की एक नई परिभाषा लिखी।
कहाँ हैं बी. पी. मंडल आज?
आज जब हम उस राजनीति की बात करते हैं, जिसमें जातिवाद, आरक्षण, और समाज के निचले वर्गों का अधिकार अहम होता है, तो बी. पी. मंडल का नाम पहले आता है। उनका कार्यकाल, उनकी विचारधारा, और उनका दृष्टिकोण हमेशा हमें याद दिलाएगा कि कैसे एक नेता ने न केवल एक राज्य, बल्कि पूरे समाज को एक नया रास्ता दिखाया।
बी. पी. मंडल की राजनीति का प्रभाव आज भी बिहार के उन गाँवों और कस्बों में महसूस किया जाता है, जहाँ उनका संघर्ष आज भी जीवित है। वह न केवल एक नेता थे, बल्कि एक आंदोलन के प्रतीक थे।