नई दिल्ली, 20 अगस्त 2025
भारत और रूस के बीच हाल ही में हुई वार्ता का केंद्र अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंध रहा। अमेरिका ने रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों, विशेषकर भारत, पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके बावजूद रूस ने भारत को भरोसा दिलाया है कि ऊर्जा सहयोग किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होगा। भारत ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देगा।
रूस का आश्वासन
रूस के राजनयिकों ने कहा कि भारत को रूस से कच्चे तेल की निरंतर आपूर्ति जारी रहेगी। रूस ने भारत को तेल पर 5–7 प्रतिशत की छूट देने और रुपये में भुगतान प्रणाली को मज़बूत करने का आश्वासन दिया।
वर्तमान में, भारत के कुल तेल आयात में रूस का हिस्सा लगभग 35 प्रतिशत है। यह एक ऐतिहासिक परिवर्तन है क्योंकि 2021 तक यह हिस्सा 0.2 प्रतिशत से भी कम था। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने एशियाई देशों को बड़ी छूट पर तेल बेचना शुरू किया, जिससे भारत जैसे देश सबसे बड़े खरीदार बन गए।
अमेरिका का दबाव और टैरिफ
दूसरी ओर, अमेरिका ने भारत पर हाल ही में 50 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ा दिए हैं। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत पर आरोप लगाया कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदकर वैश्विक बाजार में ऊँचे दामों पर बेच रहा है और इस तरह लगभग 16 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त लाभ कमा चुका है।
अमेरिका का कहना है कि यह लाभ रूस के युद्ध प्रयासों को अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय मदद देता है। वाशिंगटन ने इसे “अनुचित लाभ कमाना” (profiteering) बताया और भारत से रूस पर निर्भरता कम करने की अपील की।
त्रिपक्षीय वार्ता की संभावना
रूस ने अमेरिकी दबाव के बीच संकेत दिया है कि जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक त्रिपक्षीय बैठक हो सकती है।
रूस के राजदूत रोमन बाबुषकन ने कहा,

“भारत, रूस और चीन का साथ आना केवल ऊर्जा सहयोग ही नहीं बल्कि वैश्विक संतुलन के लिए भी ज़रूरी है। अमेरिका के टैरिफ और प्रतिबंध अन्यायपूर्ण हैं और हमें एक साझा रणनीति बनानी होगी।”
यह वार्ता एशिया में नई सामरिक धुरी (Strategic Axis) की ओर इशारा कर रही है।
भारत-रूस संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और रूस (पूर्व में सोवियत संघ) के संबंध दशकों पुराने हैं।
- शीत युद्ध काल (1950–1980): भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, लेकिन सैन्य और तकनीकी सहयोग के लिए रूस पर गहरी निर्भरता रही।
- आर्थिक सहयोग: रूस ने भारत के रक्षा क्षेत्र में विमान, टैंक और परमाणु तकनीक उपलब्ध कराई।
- ऊर्जा क्षेत्र: 2000 के दशक में रूस ने भारत को साखालिन गैस परियोजना और तेल आपूर्ति में साझेदार बनाया।
- यूक्रेन युद्ध के बाद: रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगने के बाद भारत उसका सबसे बड़ा तेल खरीदार बना।
यानी भारत-रूस संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह रणनीतिक साझेदारी (Strategic Partnership) का प्रतीक हैं।
भारत-अमेरिका संबंधों की पृष्ठभूमि
- 1990 के दशक से भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और तकनीकी सहयोग बढ़ा।
- 2008 का न्यूक्लियर डील दोनों देशों के रिश्तों का महत्वपूर्ण मोड़ था।
- आज अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन रूस से तेल खरीद को लेकर दोनों के बीच मतभेद हैं।
- हाल ही में अमेरिका ने भारत पर यह आरोप लगाया कि वह रूस से सस्ते तेल का “व्यापारिक फायदा” उठा रहा है।
यानी भारत को अपनी कूटनीति में संतुलन की नीति (Balancing Act) अपनानी पड़ रही है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
- भारत सरकार: विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति पर कायम रहेगा।
- विपक्ष: कांग्रेस और अन्य दलों ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ से भारत में महँगाई बढ़ सकती है और आम जनता प्रभावित होगी।
- रूस: अमेरिका के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत-रूस साझेदारी किसी तीसरे देश की मंज़ूरी पर निर्भर नहीं करती।
- अमेरिका: लगातार दबाव बना रहा है कि भारत रूस से दूरी बनाए।
असर और विश्लेषण
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मसला केवल तेल व्यापार का नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन (Global Power Balance) का हिस्सा है।
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत को अपनी बढ़ती आबादी और अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की जरूरत है, इसलिए रूस से तेल खरीद जारी रखना उसकी मजबूरी है।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत अमेरिका और रूस दोनों का साझेदार है। ऐसे में दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन होता जा रहा है।
- भविष्य की रणनीति: अगर त्रिपक्षीय बैठक (भारत-रूस-चीन) होती है, तो यह अमेरिका के खिलाफ एशियाई सहयोग को मज़बूती देगी।
- आर्थिक असर: अमेरिकी टैरिफ का असर भारतीय निर्यात और वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है, जिससे महँगाई और व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका है।
निष्कर्ष
भारत और रूस की हालिया बातचीत ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका के दबाव और टैरिफ के बावजूद दोनों देश अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सहयोग को जारी रखेंगे।
- रूस भारत को सस्ते तेल और रुपये भुगतान प्रणाली का भरोसा दे रहा है।
- अमेरिका इसे लेकर लगातार चेतावनी और दबाव डाल रहा है।
- चीन के साथ संभावित त्रिपक्षीय वार्ता इस पूरे विवाद को वैश्विक राजनीति का बड़ा मोड़ बना सकती है।
आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि भारत किस तरह ऊर्जा सुरक्षा और राजनयिक संतुलन दोनों को साथ लेकर चलता है।