नई दिल्ली, 5 अगस्त:
‘Harivansh’s Experiment with AD-Vocacy Journalism: From Ads to Action, Words to Change’ शीर्षक यह किताब मुख्यतः एक मीडिया प्रयोग की दस्तावेजी प्रस्तुति है, जिसमें संपादकीय हस्तक्षेप, सीमित संसाधन और जन-सरोकार को जोड़कर पत्रकारिता के वैकल्पिक मॉडल को रेखांकित किया गया है। पुस्तक का सम्पादन वरिष्ठ मीडिया पेशेवर ए. एस. रघुनाथ ने किया है, जो स्वयं वर्षों तक प्रभात खबर से जुड़े रहे हैं।
इस पुस्तक के संपादक ए. एस. रघुनाथ पत्रकारिता और मीडिया नीति के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने वर्षों तक प्रभात खबर के साथ काम किया और अख़बार की नीतिगत दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रघुनाथ न केवल एक कुशल लेखक हैं, बल्कि मीडिया रणनीति और कंटेंट प्लानिंग के मामलों में भी उनकी गहरी समझ रही है। उन्होंने 2005 से 2014 के बीच प्रभात खबर की कंटेंट योजनाओं, जनसरोकार अभियानों और पब्लिक-सर्विस कैंपेन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
पुस्तक में मुख्य रूप से 1990 के दशक से लेकर 2014 तक के समय को कवर किया गया है जब हरिवंश प्रभात खबर के प्रधान संपादक रहे। इस दौर को “AD-वोकेसी जर्नलिज़्म” की प्रयोगशाला के रूप में देखा गया है, जहाँ 35 से अधिक संपादकीय अभियानों को सिर्फ खबरों के जरिये नहीं, बल्कि सूचनात्मक और जागरूकता-प्रधान विज्ञापनों के जरिए भी आगे बढ़ाया गया। इन अभियानों में महिला सम्मान, मतदाता जागरूकता, बाल अधिकार, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों और लोक सेवाओं की जवाबदेही जैसे विषयों को प्राथमिकता दी गई थी।
एक दिलचस्प बात यह रही कि कई बार ये विज्ञापन नियमित कॉमर्शियल स्पेस की बजाय अख़बार के बचे हुए कागज़ों पर छापे जाते थे यानी संसाधनों की कमी को रचनात्मकता से संतुलित किया गया।
अनामिका नाथ से बातचीत पर आधारित दृष्टिकोण

इस किताब की एक योगदानकर्ता, अनामिका नाथ, जो एक स्वतंत्र मीडिया सलाहकार हैं, ने इस प्रयोग को “पत्रकारिता की सीमाओं को पुनर्परिभाषित करने वाला” बताया। बातचीत में उन्होंने बताया:
“यह सिर्फ एक अख़बार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सोच की कहानी है जिसमें पत्रकारिता को सूचना से आगे जाकर जन-संवाद और हस्तक्षेप का माध्यम बनाया गया।”
उनका मानना है कि इस पुस्तक में रेखांकित मॉडल आज की मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक वैकल्पिक खाका प्रस्तुत करता है खासकर उस दौर में जब जनहित की पत्रकारिता और विज्ञापन के बीच की रेखाएं धुंधली होती जा रही हैं। अनामिका इस बात पर ज़ोर देती हैं कि यह प्रयोग यह दिखाता है कि अगर संपादकीय निर्णयजन्य रूप से तय किए गए विज्ञापन सामाजिक सरोकारों से जुड़ें, तो वो जन-जागरण के औजार बन सकते हैं न कि केवल बाज़ार का माध्यम।
पुस्तक का स्वरूप
यह किताब पत्रकारिता, विज्ञापन और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच एक नया संवाद स्थापित करती है। इसके अध्यायों में संपादकीय दृष्टिकोण, विज्ञापन की रचनात्मकता, अभियानों के उदाहरण और उनके सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। साथ ही इसमें मीडिया उद्योग के अनुभवी लोगों के अनुभवात्मक लेख और विश्लेषण भी शामिल हैं, जो इस प्रयोग को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश करते हैं।
‘Harivansh’s Experiment with AD-Vocacy Journalism’ कोई आत्ममुग्ध दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह पत्रकारिता की एक संभावनाशील दिशा की पड़ताल है जहाँ खबरें, विज्ञापन और जनचेतना एक साझा मंच पर खड़े होते हैं। अनामिका नाथ जैसी मीडिया विशेषज्ञों की टिप्पणियां इस प्रयास को विश्लेषणात्मक गहराई देती हैं, और यह सवाल उठाती हैं कि क्या आज के डिजिटल युग में भी ऐसे मॉडल दोहराए जा सकते हैं?