भूमिका
इतिहास जब भी भारत की आज़ादी की गाथा सुनाता है, तो दो नाम गरम दल की अग्रिम पंक्ति में चमकते हैं—लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और चंद्रशेखर आज़ाद। एक ने कलम और विचार से आज़ादी की अलख जगाई, तो दूसरे ने बंदूक और बलिदान से अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। संयोग देखिए कि दोनों ही महापुरुष जुलाई माह में जन्मे—बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को हुआ, और चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को। यानी सौ साल की दूरी, लेकिन एक ही दिन, एक ही लक्ष्य—स्वराज्य।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक: “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”
बाल गंगाधर तिलक को ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आमजन को आवाज़ दी।
उनकी विचारधारा
तिलक ने उस दौर में ‘गरम दल’ की स्थापना की जब ‘मोडरेट’ यानी नरमपंथी नेता केवल याचिकाओं और संवाद से आज़ादी की मांग कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा—
“भीख से स्वराज नहीं मिलेगा, इसके लिए संघर्ष करना होगा।”
कार्य और योगदान
- केसरी और मराठा जैसे समाचार पत्रों के ज़रिए अंग्रेज़ी हुकूमत की आलोचना करते रहे।
- शिवाजी उत्सव और गणेश उत्सव को सार्वजनिक पर्व बनाकर राष्ट्रीय चेतना को जनजन तक पहुंचाया।
- 1905 के बंग-भंग आंदोलन में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
- उन्हें 1908 में बम केस में जेल हुई, और उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) में बंद किया गया।
राजनीतिक दर्शन
उनका मानना था कि अगर विदेशी हुकूमत केवल दमन की भाषा समझती है, तो हमें भी उसी भाषा में उत्तर देना चाहिए। यह गरम दल की वह सोच थी जो बाद में भगत सिंह और आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों की प्रेरणा बनी।
चंद्रशेखर आज़ाद: “मैं आज़ाद था, आज़ाद हूं और आज़ाद ही रहूंगा”
एक सदी बाद उसी दिन जन्मे चंद्रशेखर आज़ाद ने स्वतंत्रता संग्राम को हथियारों के बल पर आगे बढ़ाया।
शुरुआत से ही विद्रोही
- 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और गिरफ्तारी के बाद जब कोर्ट में नाम पूछा गया, तो कहा: “नाम – आज़ाद, पिता का नाम – स्वतंत्रता, पता – जेल।”
HSRA और क्रांतिकारी आंदोलन
- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख नेता बने।
- भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को संगठित किया।
- सांडर्स हत्याकांड और काकोरी कांड जैसे साहसिक अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई।
बलिदान
27 फरवरी 1931, इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से घिर जाने के बाद उन्होंने अपने आखिरी गोली खुद को मारी, ताकि अंग्रेज़ उन्हें ज़िंदा न पकड़ सकें।
गरम दल की विरासत
जहां तिलक ने राजनीतिक चेतना और राष्ट्रभक्ति की चिंगारी सुलगाई, वहीं आज़ाद ने उस चिंगारी को ज्वाला बना दिया। दोनों का सपना एक था—स्वतंत्र भारत।
तिलक के विचारों ने जहां जनता को जागरूक किया, वहीं आज़ाद की क्रांति ने अंग्रेज़ी शासन को झकझोर कर रख दिया।
आज की प्रासंगिकता
आज जब हम आज़ादी का अमृतकाल मना रहे हैं, तब इन दोनों महापुरुषों की जयंती हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक मानसिक और सामाजिक आंदोलन भी थी।
तिलक ने ‘स्वराज्य’ की नींव रखी और आज़ाद ने उसे खून से सींचा। आज जरूरत है कि हम उनके बलिदान और विचारों को केवल इतिहास में बंद न करें, बल्कि अपनी सोच और कर्म में उतारें।
जुलाई की 23 तारीख़ हर साल हमें याद दिलाती है कि जब भी देश पर संकट आया, तब किसी न किसी को आगे आना पड़ा—कलम लेकर या बंदूक लेकर।
बाल गंगाधर तिलक और चंद्रशेखर आज़ाद दो युगों की दो मशालें हैं, जिनकी रोशनी में आज भी भारत अपने आत्मसम्मान और संप्रभुता की राह पर चलता है।
उनकी जयंती पर कोटिश: नमन।