बिहार चुनाव से पहले दिल्ली की सियासत में भूचाल: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा, नीतीश कुमार के नाम से तेज़ हुई हलचल

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नई दिल्ली, 22 जुलाई

सोमवार रात भारत की राजधानी में तब राजनीतिक हलचल मच गई जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र जारी है और देश के कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी चल रही है — विशेषकर बिहार, जहां राजनीतिक समीकरण हर पल बदलते नज़र आ रहे हैं।

राष्ट्रपति भवन से देर रात जारी एक औपचारिक बयान में बताया गया कि धनखड़ ने “स्वास्थ्य कारणों” का हवाला देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना त्यागपत्र सौंपा, जिसे तुरंत स्वीकार भी कर लिया गया। हालांकि उनके इस्तीफे के बाद उठने वाले सवाल, विश्लेषकों और विपक्षी दलों को यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि क्या यह सचमुच स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है या पर्दे के पीछे कोई गहरी राजनीतिक पटकथा तैयार हो चुकी है?

धनखड़ का इस्तीफा: महज़ स्वास्थ्य कारण या रणनीतिक ‘Exit’?

ध्यान देने वाली बात यह है कि धनखड़ हाल के महीनों में लगातार सक्रिय रहे हैं। उन्होंने न केवल संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाई बल्कि कई महत्वपूर्ण विषयों पर सार्वजनिक मंचों से बेबाक टिप्पणी भी की। स्वास्थ्य कारणों की बात ऐसे समय में आई है जब उनकी किसी बड़ी बीमारी की सूचना न तो सार्वजनिक हुई थी और न ही किसी सरकारी बुलेटिन में इसका जिक्र था।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज़ है कि धनखड़ हाल ही में सरकार के साथ कुछ संविधानिक मुद्दों पर असहमत हुए थे — विशेषकर राज्यसभा में बिलों को बगैर चर्चा के पास कराने को लेकर। क्या यह इस्तीफा उन मतभेदों का परिणाम है?

एक वरिष्ठ कांग्रेस सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “ये इस्तीफा राजनीतिक ‘समायोजन’ का हिस्सा लगता है, न कि स्वास्थ्य से जुड़ी मजबूरी का।“

संविधान क्या कहता है उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 67 (b) स्पष्ट करता है कि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति को संबोधित एक लिखित पत्र के माध्यम से इस्तीफा दे सकते हैं।
राष्ट्रपति को यह पत्र स्वीकार करने की प्रक्रिया औपचारिक मानी जाती है, यानी एक बार इस्तीफा आ जाने के बाद उसे स्वीकार करना राष्ट्रपति की संवैधानिक बाध्यता है।
उपराष्ट्रपति का पद राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकृति मिलने के तुरंत बाद रिक्त मान लिया जाता है।

अब जब पद रिक्त हो गया है, संविधान के अनुसार 60 दिनों के भीतर नए उपराष्ट्रपति का चुनाव कराया जाना अनिवार्य है। यह चुनाव चुनाव आयोग की देखरेख में होगा और संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोट डालेंगे।

अब क्यों नीतीश कुमार का नाम उभर रहा है?

धनखड़ के इस्तीफे के तुरंत बाद जिस नाम की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई, वह है <नीतीश कुमार>। सात बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके नीतीश का राष्ट्रीय कद किसी से छुपा नहीं है।
हाल ही में भाजपा और जेडीयू के बीच एक बार फिर गुप्त संवाद, नीतीश का महागठबंधन से स्पष्ट नाराज़गी, और उनके कई बार दिए गए “मैं अब पीएम पद का दावेदार नहीं” जैसे बयानों ने यह संकेत दिया है कि वे अब एक सम्मानजनक विदाई की ओर देख रहे हैं।

बीजेपी के लिए यह स्थिति तीर से दो शिकार करने जैसी होगी:

  1. नीतीश को दिल्ली बुलाकर बिहार में सत्ता शून्यता पैदा करना, जिससे विपक्ष में टूट हो।
  2. नीतीश को उपराष्ट्रपति बनाकर ओबीसी वोट बैंक को साधना।

बिहार की राजनीति में हलचल क्यों?

बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं। महागठबंधन में लगातार मतभेद सामने आ रहे हैं — विशेषकर राजद और जेडीयू के बीच। नीतीश को उपराष्ट्रपति बना दिए जाने से न सिर्फ़ राजद नेतृत्व को झटका लगेगा, बल्कि केंद्र में बीजेपी की पकड़ और मज़बूत हो जाएगी।

क्या यह मोदी सरकार की एक ‘साफ-सुथरी विदाई योजना’ है?

नीतीश का जाना एकतरफ विपक्ष को कमजोर करेगा और दूसरी ओर नीतीश को भी वह सम्मान दिलाएगा जिसकी उन्हें आकांक्षा है। साथ ही, विपक्ष के पीएम चेहरे को भी एक तरह से ‘हटा’ दिया जाएगा।

क्या विपक्ष इसको मुद्दा बना पाएगा? या यह भी एक ‘मैनेज्ड ट्रांज़िशन’ की तरह दब जाएगा?

INDIA गठबंधन पहले से ही नेतृत्व को लेकर भ्रमित दिख रहा है, लेकिन चूंकि नीतीश कुमार इस समय NDA के सहयोगी हैं, इसलिए उनके दिल्ली जाने से विपक्षी एकता पर सीधा प्रहार नहीं होगा।

मगर बड़ा सवाल यही है
क्या विपक्ष इस घटनाक्रम को एक सुनियोजित राजनीतिक समायोजन, एक ‘इवेंट-मैनेजमेंट’ के तौर पर जनता के सामने पेश कर पाएगा?

यह पहला मौका नहीं है जब कोई संवैधानिक पदाधिकारी अचानक इस्तीफा देकर सियासी हलचल पैदा करता है। याद करें, सत्यपाल मलिक का उदाहरण जिन्होंने राज्यपाल पद से हटने के बाद सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए, लेकिन विपक्ष उन्हें कोई केंद्रीय चेहरा या मुद्दा नहीं बना सका।

धनखड़ के इस्तीफे के पीछे अगर सचमुच कोई ‘मतभेद’ या ‘नीतिगत असहमति’ है, तो क्या विपक्ष उसे उजागर कर पाएगा?

तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए यह एक अवसर है नीतीश के केंद्र की ओर बढ़ने से बिहार में खुद को फ्रंटलाइन पर लाने का। लेकिन उनके पास अनुभव की कमी, महागठबंधन में घर्षण, और सीट बंटवारे को लेकर असहमति जैसी कई अड़चनें हैं।

क्या विपक्ष इस इस्तीफे को सिर्फ एक औपचारिक घटना मान कर खामोश रहेगा?
या वह इसे जोड़कर यह नैरेटिव बनाएगा कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं में भी ‘पार्टी हित’ के मुताबिक फेरबदल कर रही है?

ये सवाल आने वाले चुनावों और संसद के मानसून सत्र में गूंज सकते हैं बशर्ते विपक्ष इसे सही समय पर उठाए।

‘स्वास्थ्य कारण’ या ‘राजनीतिक गणित’?

धनखड़ का इस्तीफा एक गंभीर संवैधानिक घटना है, लेकिन इसकी टाइमिंग, राजनीतिक समीकरण और संभावित उत्तराधिकारी के नाम को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि यह मात्र एक स्वास्थ्य कारण नहीं, बल्कि एक साफ-सूथरी सियासी चाल है।

अब सवाल यह है:

  • क्या नीतीश कुमार को उपराष्ट्रपति बना कर बीजेपी बिहार में बाज़ी मार लेगी?
  • क्या विपक्ष एक और बड़े नेता को खो देगा?
  • क्या यह महज़ एक व्यक्ति का इस्तीफा है या देश की राजनीति की दिशा बदलने वाला मोड़?

अगले 60 दिन इन सवालों के जवाब लेकर आएंगे। लेकिन फिलहाल इतना तो तय है कि दिल्ली से पटना तक, मानसून के साथ-साथ सियासत भी गरमा चुकी है।

Taazi Post

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