बिहार में चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा चुका है। नेता रैलियां कर रहे हैं, ‘वोटर बचाओ यात्राएं’ निकाली जा रही हैं और इस सियासी खींचतान के बीच चुनाव आयोग पर भी इल्जाम लगाए जा रहे हैं। ऐसे में, जब लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो एक ऐसे शख्स की याद आती है जिसने इसी संस्था को अजेय बनाया था। वह व्यक्ति थे T. N. शेषन तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन। वो दौर था जब चुनाव आयोग महज एक सरकारी विभाग नहीं, बल्कि एक फौलादी प्रहरी था, जिससे नेता या तो भगवान से डरते थे या फिर शेषन से।
1990 का दशक भारतीय राजनीति में अराजकता और अव्यवस्था का दौर था। चुनाव प्रक्रिया पर धनबल और बाहुबल की काली छाया इस कदर हावी हो चुकी थी कि लोकतंत्र की पवित्रता पर ही सवाल उठने लगे थे। फर्जी वोटिंग, बूथ कैप्चरिंग और चुनावी धांधली आम बात थी। नेता और उनके गुर्गे सत्ता की धुन में संविधान और नियमों की धज्जियां उड़ाने से भी नहीं हिचकते थे। ऐसे अराजक माहौल में, एक व्यक्ति भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) के रूप में सामने आया, जिसने न सिर्फ व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि उसे जड़ से बदल दिया। उनका नाम था T N शेषन तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन। वो गर्व से कहा करते थे, “मैं नाश्ते में नेताओं को खाता हूं,” और उनके इस जुमले में छिपी फौलादी इच्छाशक्ति ने पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। शेषन की कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, बल्कि उस प्रशासक की है, जिसने लोकतंत्र की पवित्रता को बहाल करने के लिए हर चुनौती को स्वीकार किया और यह साबित किया कि एक अकेला आदमी भी अगर ठान ले, तो पूरी व्यवस्था को झुका सकता है।
दृढ़ता की पहली झलक: मद्रास ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का किस्सा

शेषन का जन्म 15 दिसंबर 1932 को केरल के पलक्कड़ जिले में हुआ था। वे बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी और बेहद अनुशासित थे। उन्होंने मद्रास क्रिस्चियन कॉलेज से फिजिक्स में स्नातक किया। 1954 में यूपीएससी की परीक्षा पास करने के बाद, उन्होंने प्रशासनिक सेवा में कदम रखा और जल्द ही अपनी ईमानदारी और कठोरता के लिए जाने जाने लगे।
उनकी कार्यशैली का पहला बड़ा किस्सा 1962 में सामने आया, जब उन्हें मद्रास ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का डायरेक्टर बनाया गया। यह पद संभालते ही शेषन ने अपने सख्त तेवर दिखाने शुरू कर दिए। वे ट्रैफिक नियमों को लेकर इतने सख्त थे कि खुद सड़कों पर बस ड्राइवरों को हड़काते नजर आते थे। एक दिन, एक बस ड्राइवर ने उन्हें चुनौती दी कि वे बस चलाना और उसका इंजन समझना नहीं जानते। शेषन ने इसे व्यक्तिगत रूप से लिया। उन्होंने न सिर्फ बस चलाना सीखा, बल्कि वर्कशॉप में घंटों बिताकर बस के इंजन के हर पुर्जे को समझा। एक बार तो वे एक बस को बीच रास्ते में रोककर ड्राइवर को उतारा और खुद 80 किलोमीटर तक बस चलाकर यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया। यह घटना उनकी उस मानसिकता को दर्शाती है, जहाँ वे किसी भी काम को समझने के लिए उसमें पूरी तरह से डूब जाते थे।
नौकरशाही में एक अनोखी शख्सियत
शेषन का करियर लगातार आगे बढ़ रहा था। उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री ली और 1972 में डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस में जॉइंट सेक्रेटरी बने। उस समय एक और शेषन, एन. के. शेषन, इंदिरा गांधी के सचिव थे। फोन पर होने वाले भ्रम को दूर करने के लिए टी. एन. शेषन ने एक अनोखा तरीका अपनाया। जब भी वे किसी को फोन करते, तो कहते, “हेलो, मैं स्पेस से शेषन बोल रहा हूं।” यह एक छोटा सा जुमला था, लेकिन उनकी अनूठी और हाजिर-जवाबी वाली शख्सियत को दर्शाता था।
1985 में राजीव गांधी की सरकार में उन्हें पर्यावरण और वन मंत्रालय का सचिव बनाया गया। यहाँ भी उनकी सख्ती जारी रही। वे नर्मदा और टिहरी बांध जैसी परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों के खिलाफ खड़े हो गए। उनकी सख्ती का आलम यह था कि एक बार टीवी पर “टू टाइगर्स किल्ड” की खबर देखकर उन्होंने तुरंत जांच के आदेश दिए। यह खबर लिट्टे के तमिल टाइगर्स के बारे में थी, लेकिन शेषन का खौफ ऐसा था कि किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें यह बात पहले बता सके।
शेषन का राजनीतिक अनुभव यहीं खत्म नहीं होता। 1989 में जब वी.पी. सिंह की सरकार बनी, तो उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी का पद मिला। इसी बीच कश्मीर में गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का अपहरण हो गया। मूसा रज़ा, जो उन दिनों जम्मू कश्मीर के सेक्रेटरी थे, बताते हैं कि शेषन ने उनसे तमिल में बात करने को कहा क्योंकि उन्हें टेलीफोन एक्सचेंज में अलगाववादियों के समर्थक होने का शक था। आतंकियों के रिहा होने के बाद, शेषन ने मूसा रज़ा को बधाई दी। दो साल बाद जब रज़ा ने उनसे इस बदलाव का कारण पूछा, तो शेषन ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, “खेल जैसा तुम समझ रहे हो, उससे कहीं बड़ा था। निशाना कहीं और ही लगना था।”
चुनाव आयोग की कमान: लोकतंत्र में क्रांति

1990 में शेषन ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। उन्हें यह पद दिलवाने में उनके मित्र सुब्रमण्यम स्वामी का बड़ा हाथ था। राजीव गांधी ने शेषन को यह पद दिए जाने पर चंद्रशेखर को आगाह करते हुए कहा था, “वो दाढ़ी वाला शख्स (चंद्रशेखर) उस दिन को कोसेगा, जिस दिन उसने तुम्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने का फैसला किया था।” राजीव का डर सही साबित हुआ। चुनाव आयुक्त बनते ही शेषन ने ऐलान किया, “अब मैं नाश्ते में नेताओं को खाऊंगा,” और सचमुच ऐसा ही किया।
फ़र्ज़ी वोटों पर लगाम: EPIC कार्ड पर तस्वीर
शेषन का मानना था कि भारतीय चुनावों की सबसे बड़ी समस्या फ़र्ज़ी वोटिंग है। उन्होंने सरकार के सामने फोटो वाला वोटर आईडी कार्ड (EPIC – Electoral Photo Identity Card) बनाने का प्रस्ताव रखा। सरकार ने खर्च और समय का हवाला देकर इसे खारिज कर दिया, लेकिन शेषन भी पीछे हटने वाले नहीं थे। उन्होंने एक अभूतपूर्व अल्टीमेटम दिया: “जब तक फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड नहीं बनेंगे, देश में कोई चुनाव नहीं होगा।” उनके इस सख्त रुख से पूरा राजनीतिक तंत्र हिल गया। सरकार को झुकना पड़ा, और 1993 में EPIC कार्ड की शुरुआत हुई। इस एक फैसले ने फर्जी वोटिंग को खत्म कर भारतीय चुनावों में पारदर्शिता को एक नई ऊंचाई दी।
लालू यादव से सीधा टकराव: ‘शेषन वर्सेज़ द नेशन’
शेषन के सख्त कदमों से नेताओं में हड़कंप मच गया। उनका सबसे मशहूर टकराव बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से हुआ। 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान, शेषन को बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग और धांधली की शिकायतें मिलीं। शेषन ने बिना किसी देरी के कई सीटों पर चुनाव रद्द कर दिए और फिर से चुनाव कराने का आदेश दिया। लालू यादव इतने नाराज हुए कि उन्होंने एक नारा गढ़ा: “शेषन वर्सेज़ द नेशन”। यह नारा दिखाता है कि कैसे एक अकेले आदमी ने देश के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक को भी घुटनों पर ला दिया था।
सत्ता से टकराव और एक अनोखी शख्सियत

शेषन पर लगाम लगाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने एक दूसरा रास्ता निकाला। उन्होंने दो और अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों को नियुक्त कर दिया, जिससे शेषन की शक्तियां एक-तिहाई हो गईं। शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने सरकार के फैसले को सही माना।
अपनी सख्ती के बावजूद, शेषन की शख्सियत में एक अनोखी और मजाकिया झलक भी थी। एक बार जब एआईएडीएमके के कुछ कार्यकर्ताओं ने उनके साथ मारपीट की, तो शेषन ने एक पत्रकार को शांत भाव से जवाब दिया, “मिस्टर शेषन उपलब्ध नहीं हैं।” जब पत्रकार ने कहा कि सर, आप खुद ही फोन पर हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, “मैं यह नहीं कह रहा कि शेषन घर पर नहीं हैं, मैं यह कह रहा हूं कि शेषन आपको जानकारी देने के लिए उपलब्ध नहीं हैं।”
उनकी एक और मशहूर घटना टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व एडिटर दिलीप पडगांवकर के साथ हुई। पडगांवकर ने देर रात उन्हें फोन किया ताकि उनका बयान ले सकें। शेषन ने फोन उठाते और वापस पटक देते। इसके बाद, शेषन ने पूरी रात पडगांवकर को फोन करते रहे। जैसे ही पडगांवकर फोन उठाते, शेषन फोन काट देते। अगले दिन शेषन ने कहा, “जब तक पडगांवकर माफी नहीं मांगेंगे, मैं हर रात कॉल करता रहूंगा।” शेषन समय की पाबंदी और सफाई को लेकर भी काफी मशहूर थे।
अंतिम अध्याय और एक विरासत
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में 1996 में शेषन का कार्यकाल समाप्त हो गया। उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में 1997 के राष्ट्रपति चुनाव में भाग लिया, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। अपने अंतिम दिनों में, शेषन ने चेन्नई में एक वृद्धाश्रम में समय बिताया। उनके बच्चे नहीं थे, और वे अपनी अधिकांश संपत्ति दान कर चुके थे। डिमेंशिया के चलते, वे उन्हें भी नहीं पढ़ पा रहे थे। 2019 में 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
आज भी, जब भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता और सख्ती की बात होती है, T. N. शेषन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनके द्वारा लाए गए सुधारों ने भारतीय चुनावों को हमेशा के लिए बदल दिया। शेषन ने साबित कर दिया कि एक अकेला व्यक्ति भी अगर ठान ले, तो लोकतंत्र की नींव को मजबूत कर सकता है। शेषन की विरासत भारतीय चुनाव प्रणाली के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है, जो यह याद दिलाता है कि संस्थानों की ताकत व्यक्तियों की ईमानदारी और साहस पर निर्भर करती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2022 में उनकी विरासत को याद करते हुए कहा था, “टी.एन. शेषन जैसा कोई कभी-कभार ही होता है।”