रतलाम, 17 अगस्त।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रविवार को रतलाम ज़िले के कुंडल गाँव में आयोजित एक भव्य सभा में यह घोषणा की कि राज्य को वर्ष 2028 तक भारत की “मिल्क कैपिटल” बनाया जाएगा। इस अवसर पर उन्होंने न केवल किसानों और पशुपालकों के लिए बड़े फैसले सुनाए, बल्कि कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं की भी शुरुआत की।
किसानों और पशुपालकों के लिए नई नीति
सीएम मोहन यादव ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में सरकार सीधे किसानों और पशुपालकों से दूध खरीदेगी।
- इससे बिचौलियों की भूमिका कम होगी।
- दुग्ध उत्पादकों को उचित दाम मिलेगा।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में पहचान मिलेगी।
मुख्यमंत्री का कहना था कि “हमारा लक्ष्य केवल दूध उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि इसे किसानों और युवाओं के लिए आजीविका का मज़बूत साधन बनाना है।”
बुनियादी ढाँचे में निवेश
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया—

- जावरा से उज्जैन तक ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण।
- रतलाम से खाचरोद तक चार-लेन सड़क परियोजना (लागत ₹220 करोड़)।
- सैलाना क्षेत्र के लिए ₹113 करोड़ की पेयजल एवं सिंचाई योजना।
- कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री ने लगभग ₹158 करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण और ₹87 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास किया।
इन योजनाओं से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को फायदा मिलेगा, साथ ही दूध उत्पादन, परिवहन और सप्लाई चेन भी मजबूत होगी।
पहले से उठाए गए कदम
यह घोषणा अचानक नहीं आई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कुछ महीने पहले ही राज्य के पशुपालन एवं डेयरी विभाग का नाम बदलकर “पशुपालन, डेयरी एवं गोपालन विभाग” कर दिया था।
- जून 2025 में सरकार ने गौशालाओं को ₹90 करोड़ की आर्थिक मदद दी।
- गौशालाओं के लिए दैनिक वित्तीय सहायता भी बढ़ाई गई।
- राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के साथ समझौता कर दूध उत्पादन और डेयरी उद्योग को आधुनिक तकनीक और प्रबंधन से जोड़ने की योजना बनाई गई।
आँकड़ों पर नज़र
- फिलहाल, मध्यप्रदेश भारत के कुल दूध उत्पादन का लगभग 9 प्रतिशत योगदान देता है।
- सरकार का लक्ष्य है कि इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक पहुँचाया जाए।
- इसके लिए बेहतर नस्ल की गायें, आधुनिक डेयरी तकनीक, ऑटोमैटिक मिल्क कलेक्शन सिस्टम, और कोऑपरेटिव मॉडल को बढ़ावा दिया जाएगा।
अन्य राज्यों से तुलना
भारत में दूध उत्पादन के क्षेत्र में गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य पहले से अग्रणी रहे हैं। गुजरात का अमूल मॉडल पूरे देश के लिए मिसाल माना जाता है। वहीं, यूपी देश का सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है।
अब मध्यप्रदेश इस दिशा में एक नया प्रतिस्पर्धी बनकर उभरना चाहता है। यदि योजनाएँ सही ढंग से लागू हुईं तो एमपी आने वाले वर्षों में इन राज्यों को कड़ी टक्कर दे सकता है।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
हालाँकि इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं—
- ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और चिलिंग सेंटर की कमी।
- छोटे किसानों तक तकनीकी पहुँच सीमित होना।
- पशुओं की स्वास्थ्य सेवाएँ और टीकाकरण अभी भी कमजोर कड़ी हैं।
- उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता बनाए रखना भी बड़ा सवाल है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा
मुख्यमंत्री मोहन यादव का मानना है कि दुग्ध उद्योग केवल किसानों की आय बढ़ाने का साधन नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने का भी रास्ता है।
उनके शब्दों में, “मध्यप्रदेश की धरती परंपराओं से जुड़ी है। यहाँ किसान और पशुपालक मेहनती हैं। यदि हम उन्हें उचित साधन और बाज़ार उपलब्ध कराएँगे तो आने वाले पाँच वर्षों में मध्यप्रदेश सचमुच दूध की राजधानी बनकर पूरे देश को दिशा देगा।”
निष्कर्ष
मुख्यमंत्री की यह घोषणा केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक विकास दृष्टि का हिस्सा प्रतीत होती है। यदि 2028 तक यह लक्ष्य पूरा होता है, तो मध्यप्रदेश न केवल देश का दुग्ध केंद्र बनेगा बल्कि लाखों किसानों और युवाओं के लिए रोज़गार और आत्मनिर्भरता का नया द्वार भी खोलेगा।