2025 की गर्मियों में जब बिहार में राजनीतिक स्थिरता को लेकर बहस तेज़ थी, उसी समय भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा किया। रिपोर्ट कहती है कि बिहार सरकार ने ₹70,877 करोड़ से अधिक राशि खर्च की है, लेकिन उसका कोई उपयोग प्रमाण (Utilisation Certificate) नहीं दिया गया।
इस रिपोर्ट ने न सिर्फ शासन व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया, बल्कि बिहार के विकास मॉडल और प्रशासनिक जवाबदेही की नींव को भी झकझोर कर रख दिया।
रिपोर्ट क्या कहती है?

- रिपोर्ट का शीर्षक: State Finances Audit Report for the year ended 31 March 2024
- प्रस्तुति की तारीख: 25 मार्च 2025 (बिहार विधानसभा में)
- जांच की अवधि: वित्तीय वर्ष 2023–24
- प्रस्तुत करने वाला निकाय: CAG ऑफ इंडिया
मुख्य निष्कर्ष:
- ₹70,877 करोड़ की सरकारी राशि खर्च की गई, लेकिन इसका कोई लेखा-जोखा CAG को नहीं मिला।
- उपयोग प्रमाण पत्र नहीं दिए गए, जिससे यह पता नहीं चल पा रहा कि यह पैसा किन योजनाओं या परियोजनाओं पर खर्च हुआ।
- यह राशि 2010–2023 के बीच की पुरानी उपयोग प्रमाण-पत्रों की लंबितता का भी संकेत करती है, यानी वर्षों से इसका कोई ट्रैक नहीं है।
ये आंकड़े क्यों हैं खतरनाक?
सरकारी बजट की प्रक्रिया में जब किसी विभाग को पैसा आवंटित किया जाता है, तो उसे उस खर्च का प्रमाण (UC) देना होता है — ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पैसा वास्तव में ज़मीनी योजनाओं में उपयोग हुआ या नहीं।
लेकिन जब यह प्रमाण नहीं मिलता:
- तो पैसा कहीं भी, किसी भी दिशा में खर्च हो सकता है।
- इसका दुरुपयोग, हेराफेरी और भ्रष्टाचार की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
- भविष्य में केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता भी अटक सकती है।
विपक्ष का हमला: “यह महाघोटाला है!”

CAG रिपोर्ट के आते ही बिहार की सियासत में उबाल आ गया।
विपक्ष ने क्या कहा?
- राजद के तेजस्वी यादव: “ये ₹70,000 करोड़ नहीं, बल्कि 7 लाख सपनों की हत्या है।”
- भाजपा के सम्राट चौधरी: “मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। ये प्रशासनिक भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है।”
- सीपीआई-एमएल के महबूब आलम: “जनता का पैसा हजम कर लिया गया और जवाबदेही कोई नहीं।”
मीडिया का विश्लेषण
| चैनल / पोर्टल | शीर्षक |
|---|---|
| Zee News Hindi | “बिहार में 70 हजार करोड़ का घोटाला? सरकार नहीं दे सकी खर्च का हिसाब” |
| Satyahindi | “बिहार सरकार का हिसाब गायब: 70,877 करोड़ की राशि का कोई उपयोग प्रमाण नहीं!” |
| Sanskriti IAS | “CAG रिपोर्ट से निकला बिहार घोटाले का जिन्न” (UPSC विशेष वीडियो एनालिसिस) |
रिपोर्ट में और क्या-क्या मिला?
- साल दर साल बढ़ता लंबित उपयोग प्रमाण:
- 2017: ₹10,000 करोड़
- 2020: ₹35,000 करोड़
- 2023: ₹70,877 करोड़
→ इसका मतलब है कि बिहार में प्रशासनिक स्तर पर गड़बड़ी अब स्थायी हो गई है।
- पैसा खर्च लेकिन नतीजा नहीं:
- कई योजनाओं में राशि तो जारी हुई, लेकिन प्रगति शून्य रही।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी यही स्थिति मिली।
- डेटा का अभाव:
- रिपोर्ट ने कहा कि कई विभागों ने मांगने के बावजूद दस्तावेज नहीं भेजे।
आर्थिक दृष्टिकोण: आंकड़े और विरोधाभास
बिहार का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वर्ष 2023–24 में ₹8.96 लाख करोड़ था। 2024–25 के अनुमानित बजट में यह ₹9.76 लाख करोड़ तक गया। यानी राज्य विकास के आँकड़ों में ऊपर जा रहा है।
लेकिन:
- ₹70,000 करोड़ जैसे आंकड़े का अभाव दिखाता है कि राज्य का आर्थिक अनुशासन बेहद कमजोर हो चुका है।
- विकास आंकड़ों में दिखता है, ज़मीन पर नहीं।
जनता की चिंता
आखिर यह पैसा गया कहाँ?
बिहार की आम जनता अब सवाल पूछ रही है:
- क्या यह पैसा वाकई किसी विकास कार्य में लगा?
- कहीं यह ठेकेदारों, नेताओं और बाबुओं की जेब में तो नहीं गया?
- इतने बड़े पैमाने पर बिना प्रमाण के पैसा खर्च होना क्या सिर्फ लापरवाही है, या भ्रष्टाचार?
निष्कर्ष: ज़रूरत है जवाबदेही की
CAG की रिपोर्ट कोई राजनीतिक बयान नहीं होती — यह संवैधानिक संस्था द्वारा प्रस्तुत की गई प्रमाणिक लेखा परीक्षा है। जब वह यह कहती है कि ₹70,877 करोड़ का कोई रिकॉर्ड नहीं, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अगर अब भी सरकार इस पर गंभीर नहीं हुई, तो यह लोकतंत्र में जनता के साथ एक ऐतिहासिक विश्वासघात होगा।
अगला कदम क्या होना चाहिए?
- विधानसभा में तत्काल विशेष चर्चा
- CBI या EOW जैसी एजेंसी से जांच की माँग
- हर विभाग को 90 दिन में उपयोग प्रमाण पत्र जमा कराने का निर्देश
- जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना