पटना
अब जब 2025 के अंत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, यह कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो नए सामाजिक समूहों को साधजब राजनीति में नाम, चेहरा और नेटवर्क ही मानक बन जाएं, तब किसी गुमनाम मगर ज़मीनी कार्यकर्ता का राज्य आयोग के शीर्ष पर पहुंचना खुद में एक बड़ी घटना होती है।
किशनगंज ज़िले से आने वाले बंगालभाषी नेता प्रह्लाद कुमार सरकार, जिनका नाम न पोस्टरों में दिखा, न ट्विटर ट्रेंड में चला, आज बिहार राज्य खाद्य आयोग के अध्यक्ष बनाए गए हैं। यह केवल एक नियुक्ति नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक गंभीर सामाजिक संदेश है — कि अब सत्ता में बैठी जदयू की नज़र भाषाई और हाशिए पर खड़े समुदायों की ओर भी जा रही है।
प्रह्लाद सरकार, एक ऐसा नेता जो न तो राजनीतिक दांव-पेच के लिए चर्चित रहे, और न ही मीडिया फ्रेंडली नारों के लिए जाने गए। वे किशनगंज के गांवों में, सीमांचल की पगडंडियों पर, और संगठन के छोटे-बड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। वर्षों से संगठन का साथ निभाते रहे, मगर कभी किसी पद की सार्वजनिक दावेदारी नहीं की।
जिन दिनों राजनीति में सोशल मीडिया की प्रोफाइल और पन्नों की ऊँचाई सब कुछ तय कर रही थी, उस दौर में प्रह्लाद सरकार मौन कर्मयोगी की तरह संगठन के भीतर खड़े रहे। और आज उनकी वही सादगी और प्रतिबद्धता उन्हें उस स्थान पर ले आई है जहाँ पहुंचने के लिए लोग लाखों खर्च करते हैं।
बंगालभाषी समाज को मिला प्रतिनिधित्व
किशनगंज, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, और सीमांचल के अन्य हिस्सों में बंगालभाषी समुदाय की संख्या बहुतायत में है। लेकिन बिहार की राजनीति में इस समाज को हमेशा वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया, कभी प्रतिनिधित्व देने की ईमानदार कोशिश नहीं हुई।
अब जब जदयू ने प्रह्लाद सरकार को खाद्य आयोग का अध्यक्ष बनाया है, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे बंगालभाषी समाज की पहचान और हिस्सेदारी की शुरुआत है। यह जदयू के लिए भी एक नई दिशा का संकेत है — कि पार्टी अब लव-कुश समीकरण से आगे निकलकर एक भाषाई और क्षेत्रीय संतुलन की ओर बढ़ रही है।
सीमांचल की नई राजनीतिक धुरी?

जदयू की यह चाल अगर आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण और नीति निर्माण में भी झलकती है, तो यह सीमांचल की राजनीति को एक नई धुरी पर ला सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि प्रह्लाद सरकार को क्यों नियुक्त किया गया, बल्कि यह है कि इतनी देरी क्यों हुई?
जिन ज़िलों में बंगालभाषी समाज हर बार वोट देता है, वहाँ से अब तक विधानसभा और लोकसभा में उचित प्रतिनिधित्व न मिलना, बिहार की राजनीति की एक चूक रही है। अब जदयू ने उस चूक को भरने का इशारा किया है।
यह शुरुआत है या चुनावी प्रयोग?
प्रह्लाद कुमार सरकार, एक ऐसा चेहरा जो राजनीतिक पोस्टरों से गायब रहा, लेकिन जनता की आंखों में बसा रहा।
जदयू का यह फैसला अगर केवल चुनावी समीकरण के तहत किया गया हो, तो यह समय के साथ धुंधला हो जाएगा।
लेकिन अगर यह वास्तव में प्रतिनिधित्व और समावेश की दिशा में पार्टी का संकल्प है, तो यह बिहार की राजनीति के लिए एक नया दौर साबित हो सकता है।
2025 के चुनाव नज़दीक हैं। अब देखना ये होगा कि क्या पार्टी इस पहल को नीति, टिकट और योजनाओं में भी उतारेगी — या यह नियुक्ति एक प्रतीकात्मक संतुलन मात्र रह जाएगी।